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सोमाकोठी में श्रद्धा के साथ मनाई गई बुढी दिवाली बारिश और कड़ाके की ठंड में झूम कर नाचे श्रद्धालु

  • लेखक की तस्वीर: ahtv desk
    ahtv desk
  • 27 नव॰ 2019
  • 3 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 28 नव॰ 2019

सोमा कोठी देहरा - फोटो हिमयात्री

प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार मंगसरि आमवश्य की रात धुमधाम और श्रद्धा के साथ सोमेश्वर महादेव के प्राचीन मंदिर सोमाकोठी में बुढ़ी दिवाला मनाई गई। दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने सोमेश्वर महादेव और नाग संदुलु के आगे नतमस्तक होकर अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए प्रार्थना की। देवता गणों ने प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए उनको आशिर्वाद प्रदान किये।

विधिवत रूप से बुढ़ी दिवाली की शुरूआत दोपहर 1 बजे देव सोमेश्वर महादेव और नांग संदलु के रथों को सजाया गया और उनकी पुजा की गई। शाम चार बजे मंदिर के मुख्य पुजारी श्री देवजराम शर्मा द्वारा कोठी (मंदिर) के प्रांगण में हवन कुंड तैयार किया गया और मंत्रोउचारण के साथ अग्नि प्रवजलित की गई। देवताओं को दर्शनार्थ बहार निकाला गया व देव नृत्य हुआ। शाम को 6 बजे नियमित आरती की गई।


रात को फिर सोमेश्वर महादेव के बजंतरी गाजे-बाजे के साथ देलग गये और वहां से रात की पुजा के लिए मुख्य पुजारी को मंदिर में लेकर आए। पुजा-विधान के साथ देवताओं को फिर मंदिर से बहार लाया गया। इसके बाद रातभर देवताओं के परब और कार्यक्रम चलते रहे। श्रद्धालु भावविभोर होकर देवताओं के साथ नृत्य में शामिल हुए।


सुबह बेळ प्रथा के समय कड़ाके की ठंड और बारिश हुई। खुंड बजंतरी हरि राम के मार्गदर्शन में बजंतरी सुरत राम व अन्य बजंतरियों ने जो बेहद सुंदर तरीके से सुर व ताल में देवधुन बजाई और इसी बारिश के दौरान ही देव गुर कृपा राम, राजू, काशी राम, हिरु ने अपने करतब दिखाए और देवता का संदेश सुनाया।


बुढ़ी दिवाली के पारंपरिक गीत गाते हुए लिपा राम शर्मा जी - फोटो हिमयात्री

प्रधान पुजारी श्री लिपा राम शर्मा जी के अनुसार सोमेश्वर महादेव जी रामगढ़ इलाका के देलग ग्राम में कैलाश पर्वत से आए थे। यहां तक आने के लिए उन्होंने बड़ी लंबी यात्रा करनी पड़ी। बुजर्गों बताते हैं कि सोमेश्वर जी सर्वप्रथम सिराज के सुमली गांव में आए थे। इसके बाद वह डिबरा बावड़ी पधारे थे। फिर इसके बाद ढैर में आए। ढैर के बाद भमार होते हुए वहां से कतांडा के पास गुरजुब नामक स्थान पर आए। वहां से जब उन्होंने ऊपर से देखा तो उन्होंने सात टोल दिखाई दिया। वहां के पट्टेटू (पुजारी) देलग के पुजारी से उनका वार्तालाप हुआ।


पुजारी लिपा राम शर्मा जी ने श्रद्धालुओं के साथ सामुहिक नाच गाना किया और साल में एक दिन बुढ़ी दिवाली के दिन गाए जाने वाले गीत गाए। गीतों के माध्यम से उन्होंने प्राचीन इतिहास और संस्कृति का परिचय नई पीढ़ि को सुनाया। गीतों में रामायण और महाभारत के प्रसंग व कृषि संबंधी बातें थी।


देव धुन बजाते हुए बजंतरी - हिमयात्री

इलाका वासियों को मान्यता है कि सोमेश्वर देव जी देलग के पुजारियों को खेत में मिले थे। खेत से वह उनको घर ले गए तो रात को पुजारी को सपना आया कि जहां चिंटियों की डोर है वहां पर मेरा मंदिर स्थापित किया जाए। वहां पर शिवलिंग प्रकट हुआ था। मंदिर के लिए नीचे सोमाकोठी में जमीन मांगी गई और मंदिर की स्थापना हुई।

मंदिर के पुजारी कहते हैं कि यह मंदिर सतयुग कालिन प्राचीन मंदिर है। मंदिर के प्रांगण में एक पिलर स्थित है। उस पर प्राचीन लिपी में कुछ लिखा हुआ है जिसको अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।


श्रद्धालुओं के के लिए दिन-रात भंडारे की व्यवस्था की गई। मुख्य कठेड़ा (भंडारी) बासुदेव ने बताया कि भंडारे में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने देवताओं का प्रसाद ग्रहण किया। कारदार श्री चुनी लाल पूर्व कारदार खूब राम, दौलत राम लगातार सारी व्यवस्था प्रबंध को अच्छी तरह संभाले रहे।

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